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प्लीज... आज की रात मेरे पास रुक जाओ

जो आजतक फिल्मो में देखा था, आज वो श्राविका के लिए एक हकीकत थी। वह इस वक्त शहर के सबसे आलीशान होटल, 'द राठौड़ किंग ' के प्रेसिडेंशियल सुइट में थी। कमरे के बीचों-बीच रखे उस विशाल किंग-साइज बिस्तर पर बैठी श्राविका खुद से बस एक ही सवाल कर रही थी— "ये क्या पागलपन है?"

आखिर इस आरांश सिंह राठौड़ में ऐसा क्या था?

दोपहर के 12 बजे वह ऑफिस से बस एक कप कॉफी के इरादे से निकली थी। पर तकदीर का खेल देखिए, कुछ ही घंटों में एक अजनबी ने उसे अपनी बातों के जाल में ऐसा उलझाया कि वह उसके सुइट तक खिंची चली आई। अगर कोई उससे कहता कि आज उसकी टक्कर 'राठौड़ ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज' के वारिस से होगी और रात होते-होते वह उस अरबपति के कमरे में होगी, तो शायद श्राविका उसे दो-चार खरी-खोटी सुना देती। आखिर वह खुद को एक संस्कारी और उसूलों वाली औरत मानती थी।

राठौड़ ग्रुप—देश की नंबर वन कंस्ट्रक्शन कंपनी। पीढ़ियों से चला आ रहा बिजनेस, जिसका रुतबा पूरे भारत में फैला था। शहर की हर बड़ी इमारत के पीछे इसी परिवार का नाम था। श्राविका अब समझ पा रही थी कि आरांश इतना प्रभावशाली क्यों था। उसे बचपन से ही राज करना सिखाया गया था। उसकी शख्सियत में वो राजपूताना तेवर और रसूख साफ झलकता था, जिसने श्राविका को अपने सारे कायदे-कानून भुलाने पर मजबूर कर दिया।

जैसे ही उसकी नजर उस आलीशान कमरे पर पड़ी—वो चारों तरफ की सुनहरी नक्काशी, भारी मखमली पर्दे और शाही फर्नीचर—तो उसे अचानक अपनी हैसियत का अहसास हुआ। उसे लगा जैसे वह यहाँ फिट ही नहीं बैठती।

"आरांश, मुझे नहीं लगता कि मेरा यहाँ होना सही है," उसने बिस्तर के किनारे खिसकते हुए दबी आवाज में कहा। उसकी नजरें कमरे में इधर-उधर अपने कपड़े तलाश रही थीं।

पर आरांश ने फुर्ती से उसे अपनी ओर खींच लिया। उसकी ठंडी त्वचा जब आरांश के गर्म शरीर से टकराई, तो एक पल के लिए श्राविका की धड़कनें थम सी गईं। पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई।

"रुको," आरांश ने उसकी गर्दन के पास झुककर हौले से फुसफुसाया। "हम वैसा कुछ नहीं करेंगे जो तुम नहीं चाहती, लेकिन प्लीज... आज की रात मेरे पास रुक जाओ। मुझे बस साथ की जरूरत है।"

श्राविका ने उसकी उन गहरी आँखों में झाँका। उन आँखों में एक अजीब सा आकर्षण था, एक ऐसी ज़िद जिसे ठुकराना नामुमकिन था। आरांश जैसा आदमी जिस औरत को चाहता, उसे हासिल कर सकता था। फिर उसने श्राविका को ही क्यों चुना?

दिमाग में सवालों का बवंडर था, पर जुबान साथ नहीं दे रही थी। शर्म के मारे उसने अपनी बाहें सीने पर सिकोड़ लीं।

"ठीक है, मैं थोड़ी देर और रुकूँगी, पर एक शर्त पर।" "बोलो, तुम्हारी हर शर्त मंजूर है," आरांश ने मुस्कुराते हुए कहा। "मुझे अपने कपड़े पहनने हैं।"

संयोग से, यह हफ्ता उसके एक्स-हस्बैंड निहाल का था और बच्चे उसी के पास थे, इसलिए श्राविका को घर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। बस वह एक अजनबी के सामने इस तरह असहाय नहीं बैठना चाहती थी।

तभी आरांश और करीब आया। उसने बड़े प्यार से श्राविका का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उसके होंठों पर एक गहरा, कोमल 'किस' किया। उस एक पल में श्राविका जैसे दुनिया को भूल गई। उसकी सांसें आरांश की खुशबू में इस कदर घुल गईं कि उसे कपड़ों का ख्याल तक नहीं रहा। मन किया कि बस इसी पल में थम जाए।

अपनी उंगलियां उसकी चौड़ी और कसरती पीठ पर फेरते हुए वह खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी। एक लंबी आह उसके हलक से निकली। वह जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही थी, उससे थोड़ी असहज थी और आरांश उसकी खामोशी को भांप गया था।

आरांश उठा, वॉर्डरोब की तरफ गया और एक रेशमी रोब लेकर आया। "इसे पहन लो।"

उसकी नज़रों में छिपी चाहत उसके इरादे साफ बयां कर रही थी, लेकिन उसने श्राविका की मर्जी का सम्मान किया। वह चुपचाप कमरे के दूसरी तरफ रखे सोफे पर जा बैठा और टीवी ऑन कर दिया। "तुम्हें टीवी पर क्या देखना पसंद है?" उसने रिमोट से चैनल बदलते हुए पूछा।

"मैं ज्यादा टीवी नहीं देखती," श्राविका ने कबूल किया। उसकी नजरें आरांश के उस रफ-एंड-टफ चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। उसका वो हैंडसम चेहरा और किलर एक्सप्रेशंस किसी को भी उसका दीवाना बनाने के लिए काफी था।

"आखिर तुममें ऐसी क्या बात है, श्राविका?" आरांश ने उसे गौर से देखते हुए पूछा, जैसे वह उसके दिल के राज पढ़ना चाहता हो।

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